

राजनांदगांव के चिखली क्षेत्र में आम जनता की परेशानियां अब सड़कों तक आ गई हैं। जहां एक ओर लोग पीने के पानी की भारी किल्लत से जूझ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर नगर निगम का टैंकर शहर के सूखे डिवाइडरों में जान फूंकता नजर आ रहा है। यह विडंबना न केवल प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करती है, बल्कि जनता की उपेक्षा का स्पष्ट प्रमाण भी है।

बीते दिन चिखली क्षेत्र के नागरिकों ने पानी की समस्या को लेकर चक्का जाम किया था। हाथों में पोस्टर लिए, नाराज लोग सड़क पर बैठ गए और प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी करते रहे। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि कई दिनों से नल सूखे पड़े हैं, हैंडपंप भी जवाब दे चुके हैं, और टैंकर सेवा भी नियमित नहीं है। ऐसे में गर्मी के इस भीषण दौर में पीने का पानी मिलना एक चुनौती बन चुका है।


प्रदर्शन में बुजुर्गों, महिलाओं, और बच्चों की भी बड़ी संख्या में भागीदारी रही। एक प्रदर्शनकारी ने कहा, “हमारे बच्चे प्यास से बेहाल हैं और निगम को डिवाइडर में पानी डालने की फुर्सत है। क्या डिवाइडर की हरियाली इंसानी जीवन से ज्यादा अहम हो गई है?”
दूसरी ओर, निगम के एक कर्मचारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि उन्हें ऊपर से आदेश मिला है कि शहर की सुंदरता बनाए रखने के लिए डिवाइडरों को हरा-भरा रखा जाए। हालांकि, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि नागरिकों की समस्याएं पहले सुलझाई जानी चाहिए थीं।

पत्रिका खबर ने इस मुद्दे को पहले ही प्रमुखता से प्रकाशित किया था, लेकिन प्रशासन की तरफ से बजाय कार्यवाही के सिर्फ और सिर्फ आश्वासन मिला।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला केवल पानी की किल्लत का नहीं, बल्कि प्राथमिकता की गलत समझ का है। जब शहर के नागरिक मूलभूत सुविधाओं से वंचित हों, तब सौंदर्यीकरण पर खर्च करना अव्यवस्थित प्रशासनिक नीति को दर्शाता है।
अब सवाल यह उठता है कि जिम्मेदार कौन है? क्या नगर निगम? या फिर स्थानीय प्रशासन? और सबसे बड़ा सवाल — क्या नागरिकों की जिंदगी से ज्यादा अहमियत अब डिवाइडर की हरियाली को मिल गई है?
जब तक इन सवालों का जवाब नहीं मिलेगा और ठोस कदम नहीं उठाए जाएंगे, तब तक चिखली जैसे इलाके पानी के लिए यूं ही सड़कों पर उतरते रहेंगे
