
डोंगरगढ़, 02 मई 2025:
डोंगरगढ़ के श्री सिनेमा में आज समाज सुधारक जोतिराव फुले और सावित्रीबाई फुले के जीवन पर आधारित फिल्म ‘फुले’ का प्रदर्शन तो हुआ, लेकिन इस ऐतिहासिक और प्रेरणादायी फिल्म को लेकर एक अजीब चुप्पी देखी गई। न तो सिनेमा हॉल के बाहर बैनर लगे थे, न पोस्टर और न ही किसी तरह का प्रचार-प्रसार दिखाई दिया।

यह चौंकाने वाली बात तब और भी अहम हो जाती है जब यह पता चलता है कि फिल्म के पहले शो की सारी टिकटें शो शुरू होने से दो घंटे पहले ही बिक चुकी थीं, और थिएटर हाउसफुल था। इससे स्पष्ट है कि जनता में फिल्म को लेकर उत्सुकता और समर्थन दोनों है। बावजूद इसके, फिल्म के प्रचार पर पूर्णतः विराम क्यों लगाया गया?

स्थानीय नागरिकों और दर्शकों के बीच यह चर्चा का विषय बन चुका है कि क्या धर्म नगरी डोंगरगढ़ में किसी विशेष वर्ग या विचारधारा का ऐसा दबाव है, जिससे सिनेमा प्रबंधन खुले तौर पर इस फिल्म का प्रचार करने से कतरा रहा है?

फुले दंपत्ति ने शिक्षा, समानता और महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में जो योगदान दिया है, उसे देशभर में मान्यता प्राप्त है। ऐसे में उनके जीवन पर बनी फिल्म को उचित सम्मान न मिलना चिंताजनक है।
समाज के विभिन्न वर्गों ने इस बात पर चिंता जताई है कि एक ऐसी फिल्म, जो सामाजिक बदलाव का संदेश देती है, वह भी एक धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से जागरूक नगर में, दबाव में आकर ‘अदृश्य’ बना दी जाए — यह किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है।
क्या यह केवल प्रबंधन का निर्णय है, या इसके पीछे कोई अदृश्य सामाजिक दबाव है? यह सवाल अब सार्वजनिक बहस का विषय बनता जा रहा है।
