

राजनांदगांव | 22 अप्रैल 2025
छत्तीसगढ़ में आदिवासी समाज के सदस्यों ने मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के एक विवादित बयान के विरोध में जोरदार प्रदर्शन किया। आदिवासी संगठनों ने मुख्यमंत्री का पुतला दहन कर अपनी नाराजगी जाहिर की। उनका आरोप है कि मुख्यमंत्री ने अपने बयान में आदिवासी समुदाय को हिंदू धर्म का हिस्सा बताया है, जो कि ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और संवैधानिक सच्चाई के खिलाफ है।
प्रदर्शन कर रहे आदिवासी नेताओं ने कहा कि भारतीय संविधान आदिवासियों को एक स्वतंत्र और विशिष्ट पहचान प्रदान करता है। संविधान की पाँचवीं अनुसूची में आदिवासी क्षेत्रों को विशेष अधिकार और संरक्षण दिया गया है। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज की धार्मिक आस्थाएँ, रीति-रिवाज और जीवनशैली हिंदू समाज से भिन्न हैं और उन्हें एक अलग सांस्कृतिक इकाई के रूप में मान्यता प्राप्त है।
प्रमुख तर्क के रूप में आदिवासी संगठनों ने यह भी कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955, हिंदुओं, बौद्धों, जैनों और सिखों पर तो स्वतः लागू होता है, लेकिन आदिवासी समुदायों पर यह तभी लागू होता है जब वे औपचारिक रूप से हिंदू धर्म स्वीकार करते हैं। आदिवासी समाज के पारंपरिक विवाह संस्कार, तलाक प्रक्रिया और अन्य सामाजिक व्यवस्थाएँ हिंदू विधियों से अलग हैं। इस कारण, आदिवासी समुदाय को हिंदू समाज का हिस्सा बताना उनकी सांस्कृतिक स्वतंत्रता का उल्लंघन है।

आंदोलनकारियों ने यह चेतावनी भी दी कि यदि उनकी सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान को गलत तरीके से प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया, तो वे लोकतांत्रिक तरीके से अपना विरोध जारी रखेंगे। उन्होंने सरकार से मांग की कि आदिवासियों की स्वतंत्र धार्मिक पहचान का सम्मान किया जाए और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए ठोस कदम उठाए जाएँ।
प्रदर्शन में बड़ी संख्या में आदिवासी समाज के लोग शामिल हुए और उन्होंने नारेबाजी करते हुए मुख्यमंत्री से सार्वजनिक रूप से माफी मांगने की मांग की। उन्होंने यह भी कहा कि आदिवासी समाज अपनी पहचान, संस्कृति और धर्म की रक्षा के लिए हर स्तर पर संघर्ष करेगा।
आदिवासी नेताओं ने इस मुद्दे को लेकर आने वाले दिनों में और व्यापक आंदोलन छेड़ने की चेतावनी दी है। उनका कहना है कि सरकार यदि आदिवासी समाज की संवैधानिक मान्यता और सांस्कृतिक अस्मिता को दरकिनार करने का प्रयास करती है, तो इसका व्यापक विरोध पूरे राज्य में देखने को मिलेगा।
