राजनांदगांव: यौन शोषण पीड़िता की FIR के लिए 4 वकीलों को रात 1 बजे तक करना पड़ा संघर्ष, SC/ST थाना की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल

राजनांदगांव। “जब न्याय की उम्मीद ही टूटने लगे, तो क्या बचेगा संविधान में आम आदमी का भरोसा?” — यह सवाल तब सामने आया जब यौन शोषण की शिकार एक आदिवासी युवती को अपने मामले की एफआईआर दर्ज कराने के लिए रात 12 बजे तक संघर्ष करना पड़ा, वह भी चार अधिवक्ताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं की उपस्थिति में।

मामला अनुसूचित जाति जनजाति थाना, राजनांदगांव का है, जहाँ पीड़िता जब शिकायत दर्ज कराने पहुंची, तो थाना में न तो कोई पुलिसकर्मी मौजूद था और न ही कोई ठोस जवाब। पीड़िता ने बार-बार अधिकारियों से न्याय की गुहार लगाई, लेकिन बहाने मिलते रहे — “नेटवर्क नहीं है, सिस्टम डाउन है, स्टाफ नहीं है।”

हारकर पीड़िता और उसके सहयोगी आईजी कार्यालय पहुंचे, जहाँ घंटों बैठने के बाद ही थाना को निर्देशित किया गया कि मामले की गंभीरता को समझते हुए एफआईआर दर्ज की जाए। इसके बाद भी एफआईआर दर्ज करने में घंटों का समय लग गया और शाम 7.00 बजे से रात्रि 1 बजे तक पीड़िता और अधिवक्ता थाने में बैठे रहे।

इस संघर्ष में शामिल रहे अधिवक्ता महेंद्र कुमार साहू, एडवोकेट संतोषी साहू, एडवोकेट कुणाल भंसाली, एडवोकेट गोपाल सोनी तथा सामाजिक कार्यकर्ता भूषण सिंह — सभी ने एक स्वर में कहा कि जब संस्कारधानी जैसे शहर में अनुसूचित जाति जनजाति थाने का यह हाल है, तो ग्रामीण क्षेत्रों में न्याय की स्थिति की कल्पना करना कठिन नहीं।

इस घटना ने न केवल प्रशासनिक लापरवाही को उजागर किया, बल्कि यह भी दिखा दिया कि पीड़िताओं को न्याय प्राप्त करने के लिए किस हद तक संघर्ष करना पड़ता है। एक तरफ सरकार “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” की बातें करती है, दूसरी तरफ बेटियों की एफआईआर के लिए आधी रात तक इंतज़ार करवाया जाता है।

अब समय है कि प्रशासन न केवल तकनीकी ढांचे को मजबूत करे, बल्कि संवेदनशीलता और जवाबदेही को भी प्राथमिकता दे, ताकि कोई भी पीड़िता बार-बार दरवाज़े खटखटाने को मजबूर न हो।

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