जीएसटी 2.0 – क्या यह जनता के जीवन में असली बदलाव लाएगा? : क्रांति बंजारे

राजनांदगांव, 4 सितम्बर 2025।
जीएसटी परिषद की 3 सितम्बर 2025 को हुई बैठक में कर ढांचे में किए गए संशोधनों को सरकार ने “जीएसटी 2.0” नाम दिया है। सरकार का दावा है कि यह पहल जनता को राहत देने और कर प्रणाली को अधिक सरल बनाने के उद्देश्य से लाई गई है। किंतु क्या यह बदलाव वाकई आम आदमी की जिंदगी को आसान बनाएगा या यह केवल चुनावी घोषणा बनकर रह जाएगा? इस प्रश्न को लेकर कई राजनीतिक और सामाजिक प्रतिनिधि अपनी राय रख रहे हैं।

इसी क्रम में पूर्व जिला पंचायत सदस्य क्रांति बंजारे ने जीएसटी 2.0 पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि यह कदम स्वागत योग्य तो है, लेकिन बहुत देर से उठाया गया है। उन्होंने कहा कि आवश्यक वस्तुओं और सेवाओं पर कर दरों में कटौती कागज़ पर तो राहत जैसी दिखती है, मगर असली चुनौती यह है कि इसका असर बाज़ार में वास्तविक कीमतों पर कब और कैसे दिखेगा।

क्रांति बंजारे ने सरकार से यह भी सवाल किया कि जब महंगाई लगातार वर्षों से बढ़ रही थी और जनता बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में परेशान थी, तब सरकार ने कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठाया? आखिरकार चुनाव नज़दीक आते ही यह सुधार क्यों याद आया? उनका कहना है कि जनता को केवल कागज़ी राहत नहीं, बल्कि वास्तविक जीवन में फर्क चाहिए।

उन्होंने स्पष्ट किया कि टैक्स दरों में कटौती का लाभ तभी सार्थक होगा जब हर उपभोक्ता की जेब तक यह असर पहुँचे। अन्यथा, आशंका है कि यह लाभ केवल बड़े उद्योगपतियों और कॉरपोरेट कंपनियों तक ही सीमित रह जाएगा।

क्रांति बंजारे ने छोटे व्यापारियों और मझोले उद्यमियों की समस्याओं पर भी जोर दिया। उनका कहना है कि केवल अनुपालन (Compliance) आसान करने से छोटे व्यापारियों की मुसीबतें खत्म नहीं होंगी। उन्हें सस्ती पूँजी, आसान ऋण सुविधा और बाज़ार में सुरक्षित हिस्सेदारी जैसे ठोस उपाय चाहिए। साथ ही उन्होंने मांग की कि जीएसटी दर कटौती की जमीनी स्तर पर निगरानी होनी चाहिए ताकि राहत सिर्फ सरकारी घोषणाओं तक सीमित न रहे।

उन्होंने आगे सुझाव दिया कि छोटे और मझोले व्यापारियों को विशेष वित्तीय सहयोग पैकेज दिया जाए। इससे न केवल स्थानीय कारोबार को मजबूती मिलेगी बल्कि रोज़गार के अवसर भी बढ़ेंगे।

इसके अलावा, राज्यों की समान भागीदारी को भी क्रांति बंजारे ने महत्वपूर्ण बताया। उनका कहना है कि जीएसटी नीति निर्धारण में राज्यों की बराबरी की भागीदारी सुनिश्चित करना आवश्यक है, तभी कर व्यवस्था संतुलित और जनहितैषी बन सकेगी।

अंत में उन्होंने कहा कि वे किसी भी निर्णय का समर्थन करेंगे जो सचमुच आम आदमी के जीवन में राहत लाता हो। लेकिन सरकार की जिम्मेदारी है कि जनता से यह पूछे कि जीएसटी 2.0 हकीकत में जन-कल्याणकारी सुधार है या फिर केवल राजनीतिक घोषणा।

इस तरह, जीएसटी 2.0 पर उठे सवाल और उम्मीदें दोनों ही सामने आ रही हैं। अब देखना यह होगा कि सरकार की यह नई पहल जनता के जीवन को सरल बनाती है या फिर यह भी पूर्व की तरह केवल चर्चा तक सीमित रह जाएगी।

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