

राजनांदगाव, 27 अप्रैल 2025 –
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में सिंधु नदी के पानी में कमी और पाकिस्तान से जल विवाद को लेकर एक बयान दिया, जिसमें उन्होंने सिंधु जल संधि की समीक्षा की आवश्यकता पर जोर दिया। प्रधानमंत्री के इस बयान से यह सवाल उठने लगा है कि क्या यह बयान बिहार विधानसभा चुनावों के मद्देनजर एक चुनावी रणनीति के रूप में दिया गया था।
सिंधु जल संधि: एक कानूनी पहलू
भारत और पाकिस्तान के बीच 1960 में हस्ताक्षरित सिंधु जल संधि, जो कि अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत है, भारत को पूर्वी नदियों (रवि, व्यास, सतलुज) पर पूर्ण अधिकार और पश्चिमी नदियों (सिंधु, झेलम, चेनाब) पर सीमित उपयोग का अधिकार देती है। हालांकि, यह संधि आज भी एक विवादास्पद मुद्दा रही है, और पाकिस्तान द्वारा आतंकवाद के समर्थन जैसे कारणों से भारत के लिए यह मामला और जटिल हो गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि प्रधानमंत्री का यह बयान, हालांकि, एक कानूनी दृष्टिकोण से सीधे संधि को समाप्त करने का कदम नहीं हो सकता। अंतरराष्ट्रीय कानून में इस प्रकार की संधियों को एकतरफा तरीके से समाप्त करना मुश्किल है। फिर भी, भारत के पास संधि के कुछ प्रावधानों में संशोधन करने और पाकिस्तान के व्यवहार के आधार पर कदम उठाने का विकल्प हमेशा मौजूद है।
बिहार चुनाव और राजनीतिक रणनीति
किसानों और जल संकट से जूझ रहे बिहार जैसे कृषि प्रधान राज्य में इस मुद्दे को चुनावी रणनीति के रूप में उठाना एक समझदार राजनीतिक कदम हो सकता है। बिहार में जल संकट और सिंचाई की समस्याएं वर्षों से मतदाताओं के बीच चर्चा का विषय रही हैं, और ऐसे में प्रधानमंत्री का यह बयान एक प्रतीकात्मक कदम हो सकता है, जो राज्य के किसानों को यह संदेश देता है कि केंद्र सरकार उनके जल संकट को गंभीरता से ले रही है।
पाकिस्तान पर दबाव और कूटनीतिक पहल
भारत यदि इस दिशा में कोई ठोस कदम उठाता है तो पाकिस्तान पर जल संकट के कारण आर्थिक दबाव बढ़ सकता है। हालांकि, इस कदम से अंतरराष्ट्रीय समुदाय में भी प्रतिक्रिया हो सकती है, खासकर विश्व बैंक और संयुक्त राष्ट्र जैसे मंचों पर। भारत को अपनी कूटनीतिक योजना के तहत इस मुद्दे को ठीक से हैंडल करना होगा, ताकि इसे सिर्फ आक्रामकता के तौर पर नहीं, बल्कि देश की जल सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों के दृष्टिकोण से देखा जाए।
प्रधानमंत्री का बयान सिंधु जल संधि को लेकर एक गंभीर राजनीतिक और कूटनीतिक संदेश हो सकता है, लेकिन इसका उद्देश्य सीधे तौर पर संधि को समाप्त करना नहीं है। यह बयान, संभवतः, बिहार चुनाव को ध्यान में रखते हुए किसानों और जल संकट से जूझ रहे मतदाताओं के बीच केंद्र सरकार की छवि को मजबूत करने के लिए दिया गया हो सकता है।
