चंबल नदी: गौरवमयी इतिहास से खनन के खूनी संघर्ष तक

देवरी (मुरैना), मध्यप्रदेश।
चंबल, जो कभी बागियों की धरती के रूप में जाना जाता था, जहां अपराध से निपटने के लिए खूनी संघर्ष किए गए, आज राजनीतिक रसूख और अवैध खनन का गढ़ बन चुका है। एक समय था जब यहां की घाटियों में स्वतंत्रता के अपने मायने थे, परंतु वर्तमान परिदृश्य इन घाटियों की गरिमा को लीलता नजर आ रहा है।

राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य, जो दुर्लभ प्रजातियों जैसे घड़ियाल, डॉल्फिन और कछुओं का प्राकृतिक आवास है, अब अवैध खनन के कारण खतरे में है। देवरी स्थित ईको-पार्क, जो चंबल के संरक्षण और पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए स्थापित किया गया था, अब प्रशासनिक उपेक्षा और नेताओं के हितों की बलि चढ़ रहा है।

मध्यप्रदेश विधानसभा अध्यक्ष श्री नरेन्द्र सिंह तोमर वर्तमान में मुरैना के विधायक हैं और पूर्व में सांसद एवं केंद्रीय कृषि मंत्री भी रह चुके हैं। चंबल अंचल को राष्ट्रीय राजनीति में मजबूत प्रतिनिधित्व मिला है—ज्योतिरादित्य सिंधिया, प्रद्युम्न तोमर, ऐदल सिंह कंसाना जैसे नेता इसी धरती से जुड़े हैं। यह विडंबना ही है कि जिस भूमि ने सबसे अधिक सांसद दिए, वही भूमि आज राजनैतिक संरक्षण में चल रहे अवैध खनन और खूनी संघर्षों का केंद्र बन गई है।

कर्तव्य न्याय भागीदारी आंदोलन के राष्ट्रीय संयोजक शिव शंकर सिंह गौर ने  गंभीरता से लेते हुए शासन प्रशासन का ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि,खनन माफियाओं और प्रशासन के बीच लगातार तनाव बना रहता है। कई बार यह टकराव इतना बढ़ गया कि अधिकारियों को अपनी जान की कीमत तक चुकानी पड़ी। हालिया वर्षों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जब पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी माफियाओं के निशाने पर रहे।

चंबल के एक गांव की बात करें तो यह गांव अपने आप में इतिहास समेटे हुए है—जहां से अब तक दर्जनों विधायक चुने जा चुके हैं। लेकिन सवाल यह उठता है कि इतने राजनीतिक प्रतिनिधित्व के बावजूद चंबल की स्थिति क्यों नहीं सुधरी?

चंबल की पहचान अब दो छोरों पर खड़ी है—एक तरफ पर्यटन और जैव विविधता की संभावना, तो दूसरी ओर खनन और अपराध का बढ़ता जाल। जरूरत है कि सरकार और प्रशासन मिलकर इस अंचल को उसके पुराने गौरव की ओर लौटाएं, जहां बागियों की गाथाएं स्वतंत्रता और आत्मसम्मान की मिसाल थीं, न कि लालच और खून-खराबे की कहानियां।

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