
अब सवाल यह उठता है कि आखिर कब तक प्रशासन आंखें मूंदे रहेगा? क्या किसी बड़े हादसे का इंतज़ार किया जा रहा है? क्या ग्रामीण क्षेत्र के बच्चों का भविष्य इतना सस्ता है कि उसे इस प्रकार की जर्जर इमारतों में दांव पर लगाया जाए?
ग्राम हिरणपाल का प्राथमिक विद्यालय इन दिनों खुद अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। कभी बच्चों की किलकारियों से गूंजने वाली यह पाठशाला अब खुद जर्जरता की मार झेल रही है। स्कूल भवन की हालत इतनी खराब हो चुकी है कि वह किसी भी वक्त हादसे का शिकार हो सकता है, जिससे बच्चों की जान खतरे में है।

स्कूल की दीवारें और छत जगह-जगह से टूट चुकी हैं। छत से प्लास्टर गिर चुका है और लोहे की छड़ें बाहर आ गई हैं। बारिश के मौसम में पानी टपकता है, जिससे बच्चों को जमीन पर बैठाना भी मुश्किल हो जाता है। खिड़कियाँ टूटी हुई हैं और कमरे में अंधेरा बना रहता है। यहाँ पढ़ाई की बजाय डर का माहौल रहता है।
यह स्कूल न केवल हिरणपाल, बल्कि कोटकुद और उपरकमता जैसे आसपास के गांवों के बच्चों के भविष्य की नींव है। तीनों गांवों के बच्चे इसी विद्यालय में पढ़ाई करने आते हैं। मगर ऐसी स्थिति में बच्चों का विद्यालय आना खुद एक जोखिम बन गया है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि उन्होंने कई बार पंचायत और जिला प्रशासन को आवेदन दिया, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। शासन द्वारा शिक्षा पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाने की बातें तो होती हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत इसके ठीक उलट है।
स्कूल के शिक्षकों ने भी बताया कि भवन की हालत के कारण वे खुद भी चिंता में रहते हैं और बच्चों को सुरक्षित रखने के लिए हर समय सजग रहना पड़ता है। कई अभिभावकों ने तो बच्चों को स्कूल भेजना तक बंद कर दिया है।
कर्तव्य न्याय भागीदारी आंदोलन के अध्यक्ष बस्तर संभाग राजेश्वर कांगे एवं उनकी टीम नेशासन प्रशासन से कड़ी कार्यवाही की माँग करते हुए कहा कि इस प्रकार की लापरवाही शिक्षा के अधिकार अधिनियम की भावना के विरुद्ध है। बच्चों को सुरक्षित और अनुकूल शैक्षिक वातावरण मिलना उनका मूलभूत अधिकार है
यह समय है जब शासन-प्रशासन को प्राथमिकता के आधार पर इस विद्यालय की मरम्मत करानी चाहिए और बच्चों को एक सुरक्षित, स्वच्छ एवं प्रेरणादायी शैक्षणिक वातावरण देना चाहिए।
