
रायपुर नगर निगम में उप अभियंता पद पर कार्यरत सोहन गुप्ता इन दिनों सुर्खियों में हैं। आरोप है कि विभागीय उच्च अधिकारियों और सियासी संरक्षण के चलते उनका दबदबा इतना बढ़ गया है कि निगम में उनकी हैसियत महज़ उप अभियंता की नहीं, बल्कि “सुपर कमिश्नर” जैसी हो गई है।
जानकारी के अनुसार, उद्यान शाखा प्रभारी रहते हुए गुप्ता ने 30 हज़ार पौधे लगाने का आदेश जारी किया, लेकिन मौके पर केवल 1500 पौधे ही मिले। इस कथित गड़बड़ी में लगभग 4 करोड़ रुपये के गबन का आरोप लगाया गया है। इसके बावजूद जांच उच्च अधिकारियों के दबाव में आगे नहीं बढ़ी। यही नहीं, पीपीपी मॉडल पर उद्यान रखरखाव का कार्य भी गुप्ता के प्रभाव से “अपने खास लोगों” को सौंपा गया, जिसमें करोड़ों की राशि हजम करने की बातें सामने आईं।
आरोप यह भी है कि प्रमोशन दिलाने के लिए गुप्ता ने 25 लाख रुपये एडवांस अधिकारियों को थमा दिए और अब उनके लिए निगम में “संरचना अधिकारी” नाम का नया पद तक बनाने की तैयारी है। निगम के इंजीनियरों का कहना है कि गुप्ता के बिना कोई फाइल कमिश्नर तक नहीं पहुंचती। ट्रांसफर-पोस्टिंग और टेंडर सेटिंग से लेकर ठेकेदारों से वसूली, फाइल अटकाने और अधिकारियों को धमकाने तक उनकी कार्यशैली चर्चा का विषय बनी हुई है।
इंजीनियरों का आरोप है कि सिर्फ ट्रांसफर-पोस्टिंग से ही गुप्ता ने लगभग 2 करोड़ रुपये की कमाई की है। इतना ही नहीं, 24×7 जल प्रदाय परियोजना और स्मार्ट सिटी मिशन में भी उनकी संलिप्तता पर सवाल उठ रहे हैं। ठेकेदारों से मिली महंगी गाड़ियाँ और रायपुर, भाटागांव, अमलेश्वर और चांपा में कथित बेनामी संपत्तियाँ इस कहानी को और पुख्ता करती हैं।
निगम के कई अभियंता मानते हैं कि गुप्ता को विभागीय अधिकारियों और राजनीतिक रसूखदारों का संरक्षण प्राप्त है, जिसकी वजह से उनकी शिकायतें दबा दी जाती हैं। आरोप है कि उनके बड़े IAS अफसरों से सीधे संबंध हैं। इस बीच, नाराज़ अभियंताओं ने चेतावनी दी है कि अगर गुप्ता पर कार्रवाई नहीं हुई तो वे उग्र आंदोलन करने को मजबूर होंगे।
गौरतलब है कि गुप्ता के खिलाफ शिकायतें प्रधानमंत्री कार्यालय, उप मुख्यमंत्री, नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग, मुख्य सचिव, एंटी करप्शन ब्यूरो और आर्थिक अपराध शाखा समेत कई उच्चस्तरीय दफ्तरों तक भेजी गई हैं। अब देखना यह होगा कि यह मामला भी अन्य फाइलों की तरह दब जाएगा या फिर इस पर ठोस कार्रवाई होगी।
रायपुर नगर निगम में इस कथित भ्रष्टाचार ने न केवल प्रशासनिक ईमानदारी पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि यह भी दिखा दिया है कि विभागीय संरक्षण मिलने पर एक उप अभियंता का कद किस तरह “सुपर कमिश्नर” तक पहुँच सकता है।
