
स्वास्थ्य पंचायत समन्वयक भर्ती को लेकर छत्तीसगढ़ में विवाद गहराता जा रहा है। प्रदेश स्वास्थ्य निगरानी संघ ने भर्ती प्रक्रिया में गड़बड़ी और अपारदर्शिता के गंभीर आरोप लगाए हैं। इसी मुद्दे पर सोमवार को सैकड़ों महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं ने राजनांदगांव ज़िला स्वास्थ्य कार्यालय का घेराव किया और जमकर नारेबाज़ी की।
महिलाओं ने हाथों में ज्ञापन लेकर भर्ती प्रक्रिया को रद्द कर पुनः पारदर्शी चयन की मांग की। उनका कहना है कि नियमों को दरकिनार कर मनमानी नियुक्तियां की गई हैं, जिससे योग्य उम्मीदवार वंचित रह गए।
संघ ने उठाए सवाल

संघ की ओर से दिए गए पत्र में कहा गया है कि प्रदेश की 99 प्रतिशत से अधिक पंचायतों में स्वास्थ्य पंचायत समन्वयक की नियुक्ति तो हो चुकी है, लेकिन शासन स्तर से इसके आदेश तक जारी नहीं किए गए हैं। ऐसे में पूरी प्रक्रिया संदिग्ध है।
संघ ने सवाल उठाया कि:
चयन किस संस्था ने और किस आधार पर किया?
पात्रता और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए कौन-से मानक अपनाए गए?

क्या शासन अथवा केंद्र सरकार से कोई आदेश आया था?
शिकायतों और आपत्तियों का निवारण किस प्रकार हुआ?
आंदोलन को मिला राजनीतिक समर्थन
इस आंदोलन को फॉरवर्ड डेमोक्रेटिक लेबर पार्टी का समर्थन भी मिला है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष ने भरोसा दिलाया कि वे स्वास्थ्य निगरानी संघ के साथ खड़े हैं और सरकार तक उनकी आवाज़ पहुँचाई जाएगी। उन्होंने कहा कि योग्य अभ्यर्थियों को न्याय दिलाना बेहद ज़रूरी है और यदि शासन इस पर कार्रवाई नहीं करता, तो आंदोलन को और तेज़ किया जाएगा।

महिलाओं की बड़ी भागीदारी
घेराव कार्यक्रम में महिलाओं की भारी भागीदारी रही। पारंपरिक परिधानों में आईं महिलाएं पूरे उत्साह से नारे लगाते हुए कार्यालय परिसर में डटी रहीं। उनका कहना था कि वे वर्षों से स्वास्थ्य सेवाओं में योगदान दे रही हैं, लेकिन इस तरह की अपारदर्शी नियुक्ति से उनका मनोबल टूट रहा है।
सरकार पर सीधा निशाना और चेतावनी
संघ ने छत्तीसगढ़ सरकार को सीधे तौर पर आड़े हाथ लिया है। नेताओं का कहना है कि यदि शासन ने जल्द ही उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया तो आने वाले दिनों में आंदोलन उग्र रूप ले लेगा। उन्होंने चेतावनी दी कि ज़रूरत पड़ने पर पूरे प्रदेश में धरना-प्रदर्शन और सड़क पर उतरने की नौबत आ सकती है।
शासन की प्रतिक्रिया का इंतज़ार
संघ ने मांग की है कि भर्ती प्रक्रिया की तुरंत समीक्षा हो, एएनएम/बीएमओ स्तर के अधिकारियों की भूमिका की जांच की जाए और भविष्य में नियुक्ति आदेश केवल शासन स्तर से ही जारी हों।
अब सबकी निगाहें शासन की अगली प्रतिक्रिया पर टिकी हुई हैं।
